Title :-Language, Resistance, and Identity Voices in Hindi Dalit Autobiographies Download
Author :-Monika parihar
DOI-10.71037/gyanvividha.v2i2.23
cite this article:
parihar Monika, ”Language, Resistance, and Identity Voices in Hindi Dalit Autobiographies”, Published in GYANVIVIDHA, ISSN: 3048-4537(O) & 3049-2327 (P), Volume-2 | Issue- 2, Apr.-June 2025, Page No. :-150-155. URL: https://journal.gyanvividha.com/wp-content/uploads/2026/05/Monika-parihar-Gyanvividha-vol2-issue-2ISSN-3048-4537O-3049-2890O-Apr.-June-2025-pp150-155.pdf
Abstract : विकासशील एवं लोकतांत्रिक राष्ट्रों में संघवाद (Federalism) शासन की बहु-स्तरीय संरचना प्रदान करता है, जहाँ केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार, कर्तव्य तथा ज़िम्मेदारियाँ स्पष्ट रूप से विभक्त होती हैं। भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की राष्ट्रीय ई-शासन योजना (NeGP) एवं 2015 में प्रारम्भ हुई डिजिटल इंडिया पहल ने डिजिटल सेवाओं के समन्वय हेतु एक समग्र रूपरेखा प्रस्तुत की है। इन पहलों के तहत विभिन्न केंद्रीय तथा राज्य स्तरीय विभागों को आपस में डेटा साझा करने, सेवाएँ डिलीवर करने तथा नागरिकों को पारदर्शी रूप से जानकारी उपलब्ध कराने के लिए तकनीकी और संस्थागत अवसंरचना की आवश्यकता है। हालांकि, संघीय ढाँचे में देश के विभिन्न भागों तथा विभागों के बीच समन्वय, डेटा स्थानांतरण एवं गोपनीयता सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।हिन्दी दलित आत्मकथाएँ केवल निजी जीवन-वृत्त नहीं हैं; वे भारतीय समाज की जातिगत संरचना, सत्ता-संबंधों, अपमान की भाषिक रचना और मनुष्यत्व की पुनर्स्थापना का सशक्त अभिलेख हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में जूठन, अपने-अपने पिंजरे, दोहरा अभिशाप, तिरस्कृत, मेरा बचपन मेरे कंधों पर और मुर्दहिया जैसी प्रतिनिधि कृतियों के आधार पर यह विवेचन किया गया है कि दलित आत्मकथाओं में भाषा महज़ संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि स्मृति, प्रतिकार और अस्मितामूलक पुनर्जन्म की सक्रिय शक्ति है। इन आत्मकथाओं में जातिसूचक संबोधन, लोकभाषा, देह-आधारित अनुभव, भूख, श्रम, विद्यालय, पानी, विवाह, स्त्री-अनुभव और सामाजिक बहिष्कार—सभी भाषा में एक वैकल्पिक इतिहास के रूप में रूपायित होते हैं। शोध का निष्कर्ष यह है कि हिन्दी दलित आत्मकथाएँ हिन्दी गद्य को नई भाषिक ऊर्जा, नया सौन्दर्यबोध और न्यायमूलक वैचारिक दिशा प्रदान करती हैं; इनके भीतर प्रतिरोध और अस्मिता एक-दूसरे से अलग न होकर भाषा के स्तर पर ही निर्मित होते हैं। (वाल्मीकि, 1997; नैमिशराय, 2008; बैसन्त्री, 1999; तुलसीराम, 2010)।
Keywords : दलित आत्मकथा, भाषा, प्रतिरोध, अस्मिता, स्वानुभूति, लोकभाषा, दलित स्त्री-अनुभव, हिन्दी साहित्य।
Publication Details:
Journal : GYANVIVIDHA (ज्ञानविविधा)
ISSN : 3048-4537 (Online)
3049-2327 (Print)
Published In : Volume-2 | Issue-2, Apr.-June 2025
Page Number(s) : 150-155
Publisher Name :
Mrs Anubha Chaudhary | https://journal.gyanvividha.com | E-ISSN 3048-4537 | P-ISSN 3049-2327




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